रविवार, 20 दिसंबर 2009

Abhi baki hai...

Abhi kuch sawalon ka aana Baki hai,
Haan ya na mein Jawabon ka aana baki hai,
Ai raat zara ahista chal.... Waqt mukarar hua hai,
abhi khwabon mein kisi ka milne aana baki hai.

Dil ko sukun mile aisi kuch dawa kar,
sabhi ko mile pyar aisi dua kar,
kuch hame bhi haq hai hansne muskurane ka 
So le abhi ke baad mein INTEZAAR lamba Baki hai. 
 
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किसी को वफ़ा तो किसी को सहारा नहीं मिलता..........

दूर  इन  गलियों  में  किसी  का  आना  जाना  नहीं  होता ,
कभी  ख़ुशी  का  तो  कभी  मेरा  ठिकाना  नहीं  होता  ,
निकलता  है  सूरज  रोज़  उसी  जगह  से 
पर  जाने  क्यों  इस  दिल  में  रौशनी  का  आना  जाना  नहीं  होता ….

कहते  है  मोहब्बत  का  कोई  मुकाम  तीय  नहीं  होता,
दुनिया  में  इश्क  वालों  का  अंजाम  तय   नहीं  होता ,
तकदीर  ऊपर  वाला  ही  लिखता  है  सबकी
किसी  को  वफ़ा  तो  किसी  को  सहारा  नहीं  मिलता ...

....................................................... उषा निश्छल

शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

Your Love .... My Life.........

तू साथ है तो जिंदगी से डर नही लगता |
दुनिया में कोई भी काम कठिन नहीं लगता ||
तुने इतना साहस दिया कि हर तूफ़ान, हर रुकावट से लड़ सकता हूँ |
ये  तेरे प्यार की ही ताकत है कि, हर गम को हंस के सह लेता हूँ ||
ये तेरा प्यार मुझे कभी कमज़ोर नही होने देगा |
मैं कभी हार भी गया तो मुझे टूटने  नहीं देगा ||

मैं जानता हूँ मेरी मंजिल मुझे नही मिलेगी , तेरे रास्ते मेरी राहों से नहीं मिलेंगे |
तुम कुछ दूर ही मेरे साथ चल पाओगे, फिर कहीं परम्पराओं के धुंध में खो जाओगे ||

पर क्या प्यार का मतलब पाना होता है ?
तुम मुझे प्यार करो तो ही मैं तुम्हे चाहूँ, ये तो अपने आप से प्यार करना होता है||
मैं तुम्हे सच्चे दिल से चाहता हूँ और हमेशा चाहूँगा|
इसी एहसास से मैं अपनी जिंदगी बिताऊंगा ||

जब तक है तेरा साथ, हंसते हुए जिंदगी जी लूँ ,
इन अनमोल पलों को आँखों में छुपा लूँ |
तेरी हर एक बात, हर मुलाकात, तेरी हंसी को, तेरी हर एक अदा को यादों में सजा लूँ ||
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शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

प्रेम-डगर


है ये लंबा सफर ,चलना है उम्र भर |
हंसके रस्ता कटे ,प्यार की बात कर ||
लोग मतलब की अब बात करने लगे |
लोग अपने पड़ोसी से डरने लगे ||
ऐसा माहौल हमको बनाना है अब |
खुशियाँ जाने न पायें शहर छोड़ कर ||
कृष्ण , ईशा ने , नानक ने , इक बात की |
सबने सम्मान की , हर इक जात की ||
सबके तालीम में , एक ही बात थी |
रास्ते हैं कई , एक मंजिल मगर ||
जब गुनहगार बस एक इंसान हो |
सारा मजहब ही क्यों उसका बदनाम हो ?
मत बनाओ , ऐसे इबादत के घर |
जो बन जाते हैं , सियासत के घर ||

ये जिंदगी बता ......

ये जिंदगी एक सवाल का तू  जवाब दे मुझे
मैं क्या हूँ  ये तू ही बता दे मुझे
वो  पूछते है मुझसे मैं लकी हूँ या अनलकी 
क्या कहूँ उनसे ये तू ही समझा  दे मुझे
आज तक जो भी चाह वो तो तुमने दिया नहीं कभी 
जो बिना मांगे मिलना चाहिए वो भी तो मैंने पाया नही कभी
पर जो भी दिया तुने मुझे हंसकर कबूल था,
कभी पलटकर कुछ कहा भी नहीं तुझे 
मेरी चाहतों के सिवा बहुत कुछ दिया तुमने 
क्यों वो ना दिया जो चाहा है  मैंने
मैं फिर भी खुश हूँ कि  तुमने मुझे कुछ तो दिया
क्योंकि कुछ लोगों को तो तुमने कुछ भी ना दिया 
पर विडम्बना ये है कि 
उनके  इस सवाल में, मैं कहूँ क्या खुद को

इस उलझन से अब  तू ही निकाल  मुझे 
अगर लकी कहोगे  हो तो मेरी चाहत कि  हर खुसी देनी होगी मुझे
और अगर अनलकी हूँ तो फिर तुमको रुलाना होगा मुझे 
ये जिंदगी बता............ क्या हूँ मैं ...........
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ये जिंदगी तुने लहू लेकर दिया कुछ भी नहीं 
तेरे दामन  में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं 
तू चाहे तो इन  हांथों कि तलाशी ले ले 

इनमें लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं

कौन समझेगा मुझे ..........

मिलती है तेरे प्यार से लय तो, शब्दों को सजाता हूँ |
छू जाते हो जब तुम ख्यालों को, तब कही लिख पता हूँ |
जो तू ना होगा मेरे लिए तो तनहा हो जाऊंगा, कौन समझेगा मुझे किसके लिए लिख पाउँगा |
अब कौन देगा सहस मुझे , शायद जिंदगी में कुछ ना बन पाउँगा |
कौन समझेगा मुझे किसके लिए लिख पाउँगा |
जिंदगी ना जाने किस मोड़ पर है, एक धुंधली सी तस्वीर इन आँखों में है|
जिंदगी में जो कुछ मिलेगा मुझे , उसे देकर तुम्हारा नाम दुनिया से चला जाऊंगा |
कौन समझेगा मुझे किसके लिए लिख पाउँगा 

बुधवार, 14 अक्टूबर 2009

मेरे दिल कि बात

 आपसे कुछ कहने का जब जब ख्याल आया है, 
पहले बड़े जतन से हमने लफ्जों को सजाया है,
राह में अचानक जब आप नज़र आते हैं,
होठों पर सजाये सारे बोल बिखर जाते हैं, 
फिर सोचने लगते हैं कैसे शुरुआत करें ,
आखिर कैसे जाहिर करें हम अपने दिल कि बात, 
जब कुछ कहने को होते हैं तो आप गुज़र जाते हैं, 
हार करा जज़्बात कागज़ पर सजाये जाते हैं,
यूँ तो ज्यादा नहीं बस इतनी सी फरमाइश  है मेरी,
एक साफ़ सुथरी दोस्ती कि ख्वाहिश है मेरी,
माफ़ कर दीजियेगा  अगर ये हमारी भूल है,
एहसान होगा आपका जो ये दोस्ती कबूल है......
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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

तेरा हो लूँ पहले .....



 मैं आसमा में उड़ना तो चाहता हूँ , पर धरती का क़र्ज़ चूका लूँ पहले.
दुनिया जीतने कि हसरत तो है मेरे  दिल में , पर तुझ पर सब कुछ लुटा लूं पहले.
उँगलियों पर सबको नचाने कि चाहत सही , तेरे इशारे पे मैं नाच लूँ पहले.
दुनिया मेरी होगी और मैं दुनिया का, दो पल को बस तेरा हो लूँ आज पहले


बस तू ही तू है जीवन में

तेरी यादों में ख़ोए रातों को अक्सर सो नही पाए,
कभी पलकों से तेरी झलकों को हम खो नहीं पाए,
जमाने को ख्वाहिश थी हमें अपना बनाने की
हमारी ख्वाहिशें तुम तक, तुम्हारे हो नहीं पाए।




मोहब्ब्त है तुम्ही से, पर कहाँ हिम्म्त है कहने की,
यादों के भँवर दिल मे- कहाँ दिक्कत है सहने की,
डर इस बात का है कि तू कहीं इनकार न कर दे
खुशफ़हमी का मज़ा कुछ और तुझे अपना समझने की।


एक शिकन अकेलेपन की…
महफ़िल में साथ देनेवाले कम ही नहीं होते,
औ तन्हाई में अब मयस्सर गम भी नहीं होते।


सोमवार, 21 सितंबर 2009

सपना तब तक ही सुंदर है

सपना तब तक ही सुंदर है।
जब तक आँखों के अंदर है।
खुशियों को सहेज कर रखना
उनके खो जाने का डर है।
बुरे वक़्त में दुःख ही है, जो
साथ निभाने को तत्पर है।
रिश्तों का बनना आसां है
रिश्तों का बचना दुष्कर है।
इंसानों की मुश्किल ये है
उनके भीतर हमलावर है।

सब कुछ अपने मन का ही हो

सब कुछ अपने मन का ही हो, ऐसा कब होता है
गतिरोधों से टकरा कर, जीवन संभव होता है

पलकों तक आए और मन में, हलचल पैदा नहीं करे
ऐसा आँसू ज़िंदा हो कर भी एक शव होता है।

एकाकी लोगों से पूछो तो शायद यह पता चले
सूनेपन के अंदर-अंदर भी कलरव होता है

भली-भली बातों से कोई अच्छी कथा नहीं बनती
श्याम रंग का श्वेतों में गहरा मतलब होता है।

सुख-दुःख में जो साथ चले हैं

सुख-दुःख में जो साथ चले हैं
मीत यहाँ ऐसे विरले हैं
देखो नफ़रत की आतिश में
जाने कितने ख़्वाब जले हैं
और रखे क्या सामां पथ में
लेकर तेरी याद चले हैं
क्या लेना हमको बरसों से
पल में जी कर लौट चले है
धूप खिली है  ख़ुशियों की
ग़म के बादल लौट चले हैं

रिश्तों से अब डर लगता है

रिश्तों से अब डर लगता है।
टूटे पुल-सा घर लगता है।
चहरों पे शातिर मुस्कानें
हाथों में ख़ंजर लगता है।
संग हवा के उड़ने वाला
मेरा टूटा पर लगता है।
हथियारों की इस नगरी में
जिस्म लहू से तर लगता है।
जीवन के झोंकों पर तेरा
साथ हमें पल भर लगता है।
सारा जग सिमटा घर में तो
घर जग के बाहर लगता है।

तुम बिन यदि मैं भटक गया तो............


तुम चाहो, मत प्रीत जताना
तुम चाहो, आगोश न देना
तुम बिन यदि मैं भटक गया तो
मुझको कोई दोष न देना।

दुनिया भर की रीत निभाओ
मुझसे बँधकर क्या पाओगी
सच पूछो विश्वास नहीं कि
मेरा दर्द बँटा पाओगी
मैं तो कब का छोड़ चुका हूं
लेकर नाम तेरा संसार
मेरे साथ है जीता-मरता
इक तेरा मुट्ठी भर प्यार
मुझे न दुनियादारी भायी
मुझको तुम ये होश न देना।

मैं तो अब तक चलता आया
तेरी सुधि की बाँह गहे
पथिक कोई मिल जाए राह में
साथ चल पड़े कौन कहे
संभव है कि बिसरा दूँ मैं
तुझ पर लिखे हुए सब गीत
और तेरा विश्वास तोड़ दूँ
भूले से मेरे मनमीत
तुम्हें भुलाकर भी मैं जी लूँ
मुझको ये संतोष न देना।

              -- by : ........

जी भर के आज जी लो

बहुत गुज़र चुकी है थोड़ी सी रह गई है
जितनी भी उम्र बाकी, हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो,कल की ख़बर नहीं है।
खूबसूरत खिजां का मौसम, और झील का किनारा
ठंडी हवा के झोंके, मौसम है कितना प्यारा
है अगर कोई जन्नत, वो जन्नत यहीं है
जितनी भी उम्र बाकी हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो,कल की ख़बर नहीं है।
बेशक है बाहर सरदी, धूप घर में आ रही है
यह कुदरत ख़ुदा की, मेरे मन को भा रही है
जो हुक्म है ख़ुदा का, वो सब का सब सही है
जितनी भी उम्र बाकी हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो,कल की ख़बर नहीं है।
हर जीव को है भाई, है ऋतु बसंत आई
फूलों में है सुगन्धि, मौसम बहार लाई
जो सुवास आ रहा है, सत्य तो वही है
जितनी भी उम्र बाकी हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो, कल की ख़बर नहीं है।
है गरमी का आज मौसम, और लू भी चल रही है
आया है खूब पसीना,  दोपहर हो रही है
मेरे जिस्म की ताकत, सब कुछ यह सह रही है
जितनी भी उम्र बाकी हमसे यह कह रही है
जी भर के आज जी लो,कल की ख़बर नहीं है ।

                      -- by : ............

पा नहीं सकते


दूर हम तुमसे जा नहीं सकते
शर्त ये भी है पा नही सकते

किसी को अपने आँसुओं का सबब
लाख चाहे बता नहीं सकते

जिस पे लिक्खी है इबारत कोई
हम वो दीवार ढा नही सकते

उसको रिश्तों से है नफ़रत शायद
कोई रिश्ता बना नहीं सकते

                      

मुझे प्यार भी दो....


धूप ही क्यों
धूप ही क्यों छांव भी दो
पंथ ही क्यों पांव भी दो
सफर लम्बी हो गई अब,
ठहरने को गांव भी दो ।

प्यास ही क्यों नीर भी दो
धार ही क्यों तीर भी दो
जी रही पुरुषार्थ कब से,
अब मुझे तकदीर भी दो ।

पीर ही क्यों प्रीत भी दो
हार ही क्यों जीत भी दो
शुन्य में खोए बहुत अब,
चेतना को गीत भी दो ।

ग्रन्थ ही क्यों ज्ञान भी दो
ज्ञान ही क्यों ध्यान भी दो
तुम हमारी अस्मिता को,
अब निजी पहचान भी दो ।
                      

           

HaQeekat.....

क्यूं कहते हो मेरे साथ कुछ भी बेहतर नही होता
सच ये है के जैसा चाहो वैसा नही होता

कोई सह लेता है कोई कह लेता है
क्यूँकी ग़म कभी ज़िंदगी से बढ़ कर नही होता

आज अपनो ने ही सीखा दिया हमे
यहाँ ठोकर देने वाला हैर पत्थर नही होता

क्यूं ज़िंदगी की मुश्क़िलो से हारे बैठे हो
इसके बिना कोई मंज़िल, कोई सफ़र नही होता

कोई तेरे साथ नही है तो भी ग़म ना कर
ख़ुद से बढ़ कर कोई दुनिया में हमसफ़र नही होता.
.
                                  

शनिवार, 19 सितंबर 2009

Believe On YourSelf

तू जिंदा है तो जिंदगी कि जीत पर यकीन कर,
गर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर |

ये गम के और चार दिन, सितम के और चार दिन ,
ये दिन भी जायेंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन |

मेरी दिली ख्वाहिस

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए ,
जिसमे इंसानों को सिर्फ इन्सान बनाया जाए |

जिसकी खुशबु से महक जाए पडोसी का भी घर,
फूल इस किस्म का सिम्त लगाया जाए |

आग बहती है यहाँ गंगा में, झेलम में भी ,
कोई बतलाये ज़रा कहा चल के नागः जाए  |

जिस्म दो होकर भी दिल एक हो अपने ऐसे ,
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी ना खाया जाए |

मेरे दुःख-दर्द का तुझमे भी हो असर ऐसा ,
कि मेरे आंसू भी तेरे पलकों से उठाए जाए |

फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...

इतनी पिलाना साकी मुझको याद सुबह ना शाम रहे
ज़ुबान लड्खडाये कितनी मगर लबो पे उसका नाम रहे
हक़ मे मेरे चाहे ना हो रियासते या जन्नते
इतना कर दे दिल पे मेरे उनका हि निज़ाम रहे …
कितने हि डगमगाये कदम कितनी ही बह्के ये आंखै
मय के हर कतरे से फिर भी ज़िन्दा ये गुलफाम रहे
पिघल जाऊ बस कतरा कतरा घुल कर मय की बून्दो मे
जीना तो मुश्किल है लेकिन मरना कुछ आसान रहे
क्या मांगू मै दौलत शोहरत मुमकिन हो तो कर दे यू
कब्र तलक भी जाते जाते हाथ मे जश्न का जाम रहे : )
हारे दिल को अपने लेकिन सब कुछ जीत लिया हमने
दुनिया की नज़रो मे फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...
फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...
फिर क्यू ना हम …

खलिश

ज़माने भर के ग़मो की दवा है ज़माने मै मगर
फक़त इस दर्द- ए- दिल का इलाज नही है

मुम्किन है कल जहानो की खुशिया हो दामन मे
ये खलिश रहेगी के वो मेरे पास आज नही है

उनकी फितरत होगी अमानते लेकर भूल जाने की
अपने साये से कट जाये हम ऐसा भी मिजाज़ नही है

हमने धडकनो की वसीयते उनके नाम कर रखी है
बेदखल करे वो लकीरो से हमको कोई ऐतराज़ नही है