तू जिंदा है तो जिंदगी कि जीत पर यकीन कर,
गर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर |
ये गम के और चार दिन, सितम के और चार दिन ,
ये दिन भी जायेंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन |
शनिवार, 19 सितंबर 2009
मेरी दिली ख्वाहिस
अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए ,
जिसमे इंसानों को सिर्फ इन्सान बनाया जाए |
जिसकी खुशबु से महक जाए पडोसी का भी घर,
फूल इस किस्म का सिम्त लगाया जाए |
आग बहती है यहाँ गंगा में, झेलम में भी ,
कोई बतलाये ज़रा कहा चल के नागः जाए |
जिस्म दो होकर भी दिल एक हो अपने ऐसे ,
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी ना खाया जाए |
मेरे दुःख-दर्द का तुझमे भी हो असर ऐसा ,
कि मेरे आंसू भी तेरे पलकों से उठाए जाए |
जिसमे इंसानों को सिर्फ इन्सान बनाया जाए |
जिसकी खुशबु से महक जाए पडोसी का भी घर,
फूल इस किस्म का सिम्त लगाया जाए |
आग बहती है यहाँ गंगा में, झेलम में भी ,
कोई बतलाये ज़रा कहा चल के नागः जाए |
जिस्म दो होकर भी दिल एक हो अपने ऐसे ,
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी ना खाया जाए |
मेरे दुःख-दर्द का तुझमे भी हो असर ऐसा ,
कि मेरे आंसू भी तेरे पलकों से उठाए जाए |
फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...
इतनी पिलाना साकी मुझको याद सुबह ना शाम रहे
ज़ुबान लड्खडाये कितनी मगर लबो पे उसका नाम रहे
हक़ मे मेरे चाहे ना हो रियासते या जन्नते
इतना कर दे दिल पे मेरे उनका हि निज़ाम रहे …
कितने हि डगमगाये कदम कितनी ही बह्के ये आंखै
मय के हर कतरे से फिर भी ज़िन्दा ये गुलफाम रहे
पिघल जाऊ बस कतरा कतरा घुल कर मय की बून्दो मे
जीना तो मुश्किल है लेकिन मरना कुछ आसान रहे
क्या मांगू मै दौलत शोहरत मुमकिन हो तो कर दे यू
कब्र तलक भी जाते जाते हाथ मे जश्न का जाम रहे : )
हारे दिल को अपने लेकिन सब कुछ जीत लिया हमने
दुनिया की नज़रो मे फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...
फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...
फिर क्यू ना हम …
ज़ुबान लड्खडाये कितनी मगर लबो पे उसका नाम रहे
हक़ मे मेरे चाहे ना हो रियासते या जन्नते
इतना कर दे दिल पे मेरे उनका हि निज़ाम रहे …
कितने हि डगमगाये कदम कितनी ही बह्के ये आंखै
मय के हर कतरे से फिर भी ज़िन्दा ये गुलफाम रहे
पिघल जाऊ बस कतरा कतरा घुल कर मय की बून्दो मे
जीना तो मुश्किल है लेकिन मरना कुछ आसान रहे
क्या मांगू मै दौलत शोहरत मुमकिन हो तो कर दे यू
कब्र तलक भी जाते जाते हाथ मे जश्न का जाम रहे : )
हारे दिल को अपने लेकिन सब कुछ जीत लिया हमने
दुनिया की नज़रो मे फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...
फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...
फिर क्यू ना हम …
खलिश
ज़माने भर के ग़मो की दवा है ज़माने मै मगर
फक़त इस दर्द- ए- दिल का इलाज नही है
मुम्किन है कल जहानो की खुशिया हो दामन मे
ये खलिश रहेगी के वो मेरे पास आज नही है
उनकी फितरत होगी अमानते लेकर भूल जाने की
अपने साये से कट जाये हम ऐसा भी मिजाज़ नही है
हमने धडकनो की वसीयते उनके नाम कर रखी है
बेदखल करे वो लकीरो से हमको कोई ऐतराज़ नही है
फक़त इस दर्द- ए- दिल का इलाज नही है
मुम्किन है कल जहानो की खुशिया हो दामन मे
ये खलिश रहेगी के वो मेरे पास आज नही है
उनकी फितरत होगी अमानते लेकर भूल जाने की
अपने साये से कट जाये हम ऐसा भी मिजाज़ नही है
हमने धडकनो की वसीयते उनके नाम कर रखी है
बेदखल करे वो लकीरो से हमको कोई ऐतराज़ नही है
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