इतनी पिलाना साकी मुझको याद सुबह ना शाम रहे
ज़ुबान लड्खडाये कितनी मगर लबो पे उसका नाम रहे
हक़ मे मेरे चाहे ना हो रियासते या जन्नते
इतना कर दे दिल पे मेरे उनका हि निज़ाम रहे …
कितने हि डगमगाये कदम कितनी ही बह्के ये आंखै
मय के हर कतरे से फिर भी ज़िन्दा ये गुलफाम रहे
पिघल जाऊ बस कतरा कतरा घुल कर मय की बून्दो मे
जीना तो मुश्किल है लेकिन मरना कुछ आसान रहे
क्या मांगू मै दौलत शोहरत मुमकिन हो तो कर दे यू
कब्र तलक भी जाते जाते हाथ मे जश्न का जाम रहे : )
हारे दिल को अपने लेकिन सब कुछ जीत लिया हमने
दुनिया की नज़रो मे फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...
फिर क्यू ना हम नाक़ाम रहे ...
फिर क्यू ना हम …
शनिवार, 19 सितंबर 2009
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kya bat hai saheb ,.... bilkul sahi ja rahe ho...
जवाब देंहटाएंaaj to bahut khus hoge aap ....