शनिवार, 19 सितंबर 2009

मेरी दिली ख्वाहिस

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए ,
जिसमे इंसानों को सिर्फ इन्सान बनाया जाए |

जिसकी खुशबु से महक जाए पडोसी का भी घर,
फूल इस किस्म का सिम्त लगाया जाए |

आग बहती है यहाँ गंगा में, झेलम में भी ,
कोई बतलाये ज़रा कहा चल के नागः जाए  |

जिस्म दो होकर भी दिल एक हो अपने ऐसे ,
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी ना खाया जाए |

मेरे दुःख-दर्द का तुझमे भी हो असर ऐसा ,
कि मेरे आंसू भी तेरे पलकों से उठाए जाए |

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