शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

प्रेम-डगर


है ये लंबा सफर ,चलना है उम्र भर |
हंसके रस्ता कटे ,प्यार की बात कर ||
लोग मतलब की अब बात करने लगे |
लोग अपने पड़ोसी से डरने लगे ||
ऐसा माहौल हमको बनाना है अब |
खुशियाँ जाने न पायें शहर छोड़ कर ||
कृष्ण , ईशा ने , नानक ने , इक बात की |
सबने सम्मान की , हर इक जात की ||
सबके तालीम में , एक ही बात थी |
रास्ते हैं कई , एक मंजिल मगर ||
जब गुनहगार बस एक इंसान हो |
सारा मजहब ही क्यों उसका बदनाम हो ?
मत बनाओ , ऐसे इबादत के घर |
जो बन जाते हैं , सियासत के घर ||

ये जिंदगी बता ......

ये जिंदगी एक सवाल का तू  जवाब दे मुझे
मैं क्या हूँ  ये तू ही बता दे मुझे
वो  पूछते है मुझसे मैं लकी हूँ या अनलकी 
क्या कहूँ उनसे ये तू ही समझा  दे मुझे
आज तक जो भी चाह वो तो तुमने दिया नहीं कभी 
जो बिना मांगे मिलना चाहिए वो भी तो मैंने पाया नही कभी
पर जो भी दिया तुने मुझे हंसकर कबूल था,
कभी पलटकर कुछ कहा भी नहीं तुझे 
मेरी चाहतों के सिवा बहुत कुछ दिया तुमने 
क्यों वो ना दिया जो चाहा है  मैंने
मैं फिर भी खुश हूँ कि  तुमने मुझे कुछ तो दिया
क्योंकि कुछ लोगों को तो तुमने कुछ भी ना दिया 
पर विडम्बना ये है कि 
उनके  इस सवाल में, मैं कहूँ क्या खुद को

इस उलझन से अब  तू ही निकाल  मुझे 
अगर लकी कहोगे  हो तो मेरी चाहत कि  हर खुसी देनी होगी मुझे
और अगर अनलकी हूँ तो फिर तुमको रुलाना होगा मुझे 
ये जिंदगी बता............ क्या हूँ मैं ...........
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ये जिंदगी तुने लहू लेकर दिया कुछ भी नहीं 
तेरे दामन  में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं 
तू चाहे तो इन  हांथों कि तलाशी ले ले 

इनमें लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं

कौन समझेगा मुझे ..........

मिलती है तेरे प्यार से लय तो, शब्दों को सजाता हूँ |
छू जाते हो जब तुम ख्यालों को, तब कही लिख पता हूँ |
जो तू ना होगा मेरे लिए तो तनहा हो जाऊंगा, कौन समझेगा मुझे किसके लिए लिख पाउँगा |
अब कौन देगा सहस मुझे , शायद जिंदगी में कुछ ना बन पाउँगा |
कौन समझेगा मुझे किसके लिए लिख पाउँगा |
जिंदगी ना जाने किस मोड़ पर है, एक धुंधली सी तस्वीर इन आँखों में है|
जिंदगी में जो कुछ मिलेगा मुझे , उसे देकर तुम्हारा नाम दुनिया से चला जाऊंगा |
कौन समझेगा मुझे किसके लिए लिख पाउँगा