शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

ये जिंदगी बता ......

ये जिंदगी एक सवाल का तू  जवाब दे मुझे
मैं क्या हूँ  ये तू ही बता दे मुझे
वो  पूछते है मुझसे मैं लकी हूँ या अनलकी 
क्या कहूँ उनसे ये तू ही समझा  दे मुझे
आज तक जो भी चाह वो तो तुमने दिया नहीं कभी 
जो बिना मांगे मिलना चाहिए वो भी तो मैंने पाया नही कभी
पर जो भी दिया तुने मुझे हंसकर कबूल था,
कभी पलटकर कुछ कहा भी नहीं तुझे 
मेरी चाहतों के सिवा बहुत कुछ दिया तुमने 
क्यों वो ना दिया जो चाहा है  मैंने
मैं फिर भी खुश हूँ कि  तुमने मुझे कुछ तो दिया
क्योंकि कुछ लोगों को तो तुमने कुछ भी ना दिया 
पर विडम्बना ये है कि 
उनके  इस सवाल में, मैं कहूँ क्या खुद को

इस उलझन से अब  तू ही निकाल  मुझे 
अगर लकी कहोगे  हो तो मेरी चाहत कि  हर खुसी देनी होगी मुझे
और अगर अनलकी हूँ तो फिर तुमको रुलाना होगा मुझे 
ये जिंदगी बता............ क्या हूँ मैं ...........
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ये जिंदगी तुने लहू लेकर दिया कुछ भी नहीं 
तेरे दामन  में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं 
तू चाहे तो इन  हांथों कि तलाशी ले ले 

इनमें लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं

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