रिश्तों से अब डर लगता है।
टूटे पुल-सा घर लगता है।
टूटे पुल-सा घर लगता है।
चहरों पे शातिर मुस्कानें
हाथों में ख़ंजर लगता है।
हाथों में ख़ंजर लगता है।
संग हवा के उड़ने वाला
मेरा टूटा पर लगता है।
मेरा टूटा पर लगता है।
हथियारों की इस नगरी में
जिस्म लहू से तर लगता है।
जिस्म लहू से तर लगता है।
जीवन के झोंकों पर तेरा
साथ हमें पल भर लगता है।
साथ हमें पल भर लगता है।
सारा जग सिमटा घर में तो
घर जग के बाहर लगता है।
घर जग के बाहर लगता है।
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