मंगलवार, 26 जनवरी 2010

आग अब भी कहीं दबी सी है

हर ख़ुशी में कोई कमी सी है

हँसती आँखों में भी नमी सी है


दिन भी चुप चाप सर झुकाये था
रात की नफ़्ज़ भी थमी सी है


किसको समझायेँ किसकी बात नहीं
ज़हन और दिल में फिर ठनी सी है


ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई
गर्द इन पलकों पे जमी सी है


कह गए हम किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनी सी है


हसरतें राख हो गईं लेकिन
आग अब भी कहीं दबी सी है
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बेकार हमें ग़म होता है

सच ये है बेकार हमें ग़म होता है
जो चाहा था दुनिया में कम होता है


ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम
हमसे पूछो कैसा आलम होता है


ग़ैरों को कब फ़ुरसत है दुख देने की
जब होता है कोई हम-दम होता है


ज़ख़्म तो हम ने इन आँखों से देखे हैं
लोगों से सुनते हैं मरहम होता है


ज़हन की शाख़ों पर अशार आ जाते हैं
जब तेरी यादों का मौसम होता है

अब तुम आना जो तुम्‍हें मुझसे मुहब्‍बत है कोई

अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना
सिर्फ अहसान जताने के लिए मत आना
मैंने पलकों पे तमन्‍नाएँ सजा रखी हैं
दिल में उम्‍मीद की सौ शम्‍मे जला रखी हैं
ये हँसीं शम्‍मे बुझाने के लिए मत आना
प्‍यार की आग में जंजीरें पिघल सकती हैं
चाहने वालों की तक़बीरें बदल सकती हैं
तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना
अब तुम आना जो तुम्‍हें मुझसे मुहब्‍बत है कोई
मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई
तुम कोई रस्‍म निभाने के लिए मत आना
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